उत्तराखंड में शिक्षा नीति पर सवाल
फीस एक्ट के बिना शुल्क नियंत्रण क्यों? सरकार की नीति और नीयत पर उठे गंभीर प्रश्न - डॉ. किशोर कुमार पैन

ऋषिकेश/देहरादून, (दिलीप शर्मा): उत्तराखंड में शिक्षा की एकरूपता, शुल्क पारदर्शिता और निजी शिक्षण संस्थानों की भूमिका को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। हर वर्ष प्रवेश सत्र के साथ निजी विद्यालयों पर आरोप-प्रत्यारोप तो लगाए जाते हैं, लेकिन अब तक राज्य में स्पष्ट और कानूनी फीस एक्ट लागू नहीं किया जाना सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है।
बयानबाजी बहुत, स्थायी समाधान शून्य
राज्य में बिना फीस एक्ट के शुल्क निर्धारण किया जा रहा है, जिससे न केवल अभिभावक भ्रमित हैं बल्कि शिक्षा के बाजारीकरण का खतरा भी बढ़ रहा है। एक ही जिले में सरकारी, अनुदानित, कम लागत और महंगे निजी स्कूलों के लिए अलग-अलग मापदंड क्यों—यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।
फीस एक्ट ही न्यायपूर्ण समाधान
एसोसिएशन ऑफ प्राइवेट स्कूल्स कमेटी, उत्तराखंड का स्पष्ट कहना है कि फीस एक्ट किसी के पक्ष या विरोध में नहीं, बल्कि अभिभावक, छात्र और संस्थान—तीनों के अधिकारों और दायित्वों को संतुलित करने का कानूनी माध्यम है। बिना कानून के किया गया शुल्क नियंत्रण प्रशासनिक मनमानी को बढ़ावा देता है।
पाठ्यक्रम में असमानता, अवसरों में भेद
जब देश की शीर्ष प्रशासनिक सेवाओं के लिए एक ही पाठ्यक्रम है, तो स्कूली शिक्षा में एकरूपता क्यों नहीं? अलग-अलग बोर्ड और पाठ्यक्रम बच्चों को शुरू से ही आर्थिक व सामाजिक वर्गों में बांट रहे हैं, जिससे शिक्षा समान अवसर के बजाय असमानता का माध्यम बनती जा रही है।
तकनीकी शिक्षा की बात, किताबों पर आपत्ति
एक ओर स्किल इंडिया, एआई और तकनीकी शिक्षा की चर्चा होती है, वहीं दूसरी ओर कंप्यूटर और सामान्य ज्ञान की पुस्तकों पर आपत्ति—यह विरोधाभास शिक्षा नीति की स्पष्टता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। यदि कोई पुस्तक अवैध है, तो उसकी अनुमति और बिक्री की जिम्मेदारी किसकी है?
निजी विद्यालयों की भूमिका को नकारना अन्याय
सीमांत और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की लौ जलाए रखने में निजी विद्यालयों का बड़ा योगदान रहा है। संसाधन जुटाकर मानक पूरे करने वाले संस्थानों को “माफिया” कहना, जबकि सरकारी विद्यालयों की बुनियादी कमियों पर मौन साधना—यह दोहरा मापदंड है।
संघर्ष नहीं, संवाद और कानून जरूरी
एसोसिएशन ऑफ प्राइवेट स्कूल्स कमेटी, उत्तराखंड का कहना है कि शिक्षा सुधार टकराव से नहीं, बल्कि संवाद, विधिक स्पष्टता और पारदर्शी फीस एक्ट से संभव है। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर—चाहे वे निजी हों या सरकारी—समान कार्रवाई होनी चाहिए।
सरकार को लेना होगा स्पष्ट निर्णय
अब प्रश्न यह है कि सरकार निजी शिक्षण संस्थानों के साथ मिलकर संतुलित शिक्षा व्यवस्था बनाना चाहती है या शिक्षा को कुछ कॉर्पोरेट हाथों में सौंपने की दिशा में बढ़ रही है। निर्णय अभी भी संभव है—लेकिन उसके लिए साहस, स्पष्ट नीति और संवैधानिक प्रतिबद्धता आवश्यक है।
— डॉ. किशोर कुमार पंत
सोशल एक्टिविस्ट
(अध्यक्ष, एसोसिएशन ऑफ प्राइवेट स्कूल्स कमेटी, उत्तराखंड)









