
ऋषिकेश,( दिलीप शर्मा ) – आज हम 21वीं सदी में हैं – जहाँ एक तरफ महिलाएं अंतरिक्ष में उड़ान भर रही हैं, तो दूसरी तरफ रात के अंधेरे में रिक्त सड़कें अब भी उन्हें डरा देती हैं। यह विरोधाभास हमारी सामाजिक संरचना की उस सच्चाई को सामने लाता है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं – महिला सुरक्षा।
👣 हर कदम डर के साथ…
एक लड़की के लिए सफर सिर्फ मंज़िल तक पहुंचने का नाम नहीं है – वह हर मोड़ पर अपने कपड़ों, चाल, और आस-पास की नज़रों का हिसाब रखती है। कभी ऑटो वाले का व्यवहार संदिग्ध लगता है, तो कभी पीछे आती मोटरसाइकिल।
सुरक्षा की ये जद्दोजहद सिर्फ रात तक सीमित नहीं। स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, बस स्टैंड, मेट्रो – हर जगह एक अदृश्य भय साथ चलता है।
🧠 जब मन पर असर पड़ता है
महिला सुरक्षा सिर्फ फिजिकल स्पेस तक सीमित नहीं है। मानसिक स्तर पर भी महिलाएं हर दिन खुद को नियंत्रित करती हैं।
“इतनी जोर से मत हँसो”,
“ऑनलाइन पोस्ट मत डालो”,
“उन लड़कों से मत घुलो”,
“अगर कुछ हुआ तो बदनाम तुम ही होगी।”
यह डर उनकी उड़ान को बाँध देता है – उनके आत्मविश्वास को चोट पहुंचाता है।
🔥 जब ‘नॉर्मल’ को बदलना होगा
दोष सिर्फ उन अपराधियों का नहीं जो सड़क पर हमला करते हैं, बल्कि उस सोच का भी है जो कहती है –
“अकेली क्यों निकली थी?”
“रात में थी तो खुद की गलती है।”
यह ‘विक्टिम ब्लेमिंग’ हमारी संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है – जिसे बदलना अब बहुत ज़रूरी है।
🌼 आशा की किरणें
हाल के वर्षों में बदलाव की शुरुआत हुई है – महिलाएं आवाज़ उठा रही हैं, समाज साथ खड़ा हो रहा है, कानून सख्त हो रहे हैं। लेकिन यह तब तक अधूरा है जब तक हर लड़की बिना डर के खुलकर हँस न सके, अकेले चल ��









