
पौड़ी/परमार्थ निकेतन(ऋषिकेश),28 जुलाई 2025: विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस और श्रावण मास के तीसरे सोमवार के शुभ संयोग पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज ने सभी शिवभक्तों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि —
“प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, साक्षात् शिव स्वरूप माने। यह दिन प्रकृति और परमात्मा के पवित्र मिलन का प्रतीक है।”
स्वामी जी ने कहा कि भगवान शिव स्वयं प्रकृति के संरक्षक हैं। शिव के स्वरूप में छिपे प्रतीक — गंगा, सर्प, भस्म, नंदी और त्रिशूल — हमें जल, जैवविविधता, संयम, पशुधन और ऊर्जा संतुलन जैसे पर्यावरणीय मूल्यों की याद दिलाते हैं।
♻️ शिव स्वरूप में प्रकृति के संरक्षण का संदेश:
गंगा जटाओं में: जल संरक्षण और संतुलन
गले का सर्प: जैव विविधता का समावेश
भस्म: उपभोग पर संयम
नंदी: पशुधन और खेती का सम्मान
त्रिशूल: चेतना, ऊर्जा और न्याय का संतुलन
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि प्रकृति का संरक्षण बाहरी नहीं, आंतरिक परिवर्तन से शुरू होता है। जब व्यक्ति का जीवन संयमित, सात्विक और सेवा-प्रधान होता है, तभी उसका प्रभाव समाज और पर्यावरण पर पड़ता है।
उन्होंने चेताया कि “प्रदूषण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन आज केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न बन चुके हैं।”
🌱 संरक्षण का संकल्प:
इस अवसर पर स्वामी जी ने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया:
“आज एक वृक्ष माँ के नाम और एक वृक्ष धरती माँ के नाम अवश्य लगाएं।”
सनातन संस्कृति और प्रकृति:
उन्होंने कहा कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना में पले-बढ़े भारतवर्ष में नदियों, पेड़ों और जीवों को देवतुल्य मानकर पूजा जाता है। प्रकृति की रक्षा ही हमारे सांस्कृतिक अस्तित्व को जीवंत बनाए रखने का आधार है।









