
ऋषिकेश (दिलीप शर्मा) : मुनि की रेती स्थित श्री सीतारामदास ओंकारनाथदेव द्वारा स्थापित हृषिकेश आश्रम में बुधवार को श्री श्री जगद्धात्री देवी की पूजा विधिवत एवं शास्त्रोक्त विधि से संपन्न हुई। पूजन समारोह पंडित चिरंजीत बैनर्जी द्वारा वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ सम्पन्न कराया गया।
पूजन एवं हवन के उपरांत आश्रम प्रांगण में भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें नगर के अनेक भक्तगण श्रद्धापूर्वक सम्मिलित हुए और देवी के प्रसाद का लाभ प्राप्त किया।
जगद्धात्री पूजा का आध्यात्मिक महत्व
‘जगद्धात्री’ शब्द का अर्थ है — “जो जगत की धारिणी है”, अर्थात वह शक्ति जो संपूर्ण सृष्टि का धारण, पोषण और संरक्षण करती हैं। माँ जगद्धात्री को देवी दुर्गा का ही एक सौम्य और धैर्यपूर्ण रूप माना गया है। उनका श्वेतवर्णी स्वरूप चार भुजाओं वाला है, जिनमें वे शंख, धनुष, बाण और चक्र धारण किए रहती हैं तथा सिंह पर आरूढ़ रहती हैं। उनके चरणों तले दबा हाथी अहंकार और आसुरी प्रवृत्ति का प्रतीक है।
माँ जगद्धात्री की उपासना अहंकार के दमन, स्थैर्य और संतुलन की साधना तथा भक्ति के आंतरिक अर्थ की अनुभूति का प्रतीक मानी जाती है। वे यह सिखाती हैं कि शक्ति का सर्वोच्च रूप संतुलन, करुणा और आत्मसंयम में निहित है।
परंपरा और पूजा का समय
जगद्धात्री पूजा कार्तिक शुक्ल नवमी को मनाई जाती है — जो दीपावली के लगभग दस दिन बाद आती है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के चन्दननगर और नदिया जिलों में यह उत्सव अत्यंत भव्य रूप में आयोजित किया जाता है।
देवी भागवत और तंत्रशास्त्रों के अनुसार, माँ जगद्धात्री मूलाधार से सहस्रार तक चढ़ने वाली शक्ति का स्थिर रूप हैं, जिनका स्मरण साधक को आत्मसंयम, करुणा और ब्रह्मानुभूति की दिशा में अग्रसर करता है।









