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देवभूमि में फिर बुझा एक चिराग: शराब के नशे में अजय ठाकुर ने विकलांग अजेन्द्र कंडारी की कर दी निर्मम हत्या, उठे शराब ठेकों पर बंदी के स्वर

मुनिकीरेती में घटी हृदयविदारक घटना — शराब के ठेकों के खिलाफ जनता में फूटा आक्रोश, परिजनों ने मांगी इंसाफ और देवभूमि को नशे से मुक्त कराने की गुहार

 

ऋषिकेश/मुनिकीरेती (दिलीप शर्मा) : देवभूमि एक बार फिर शराब के ज़हर से दहल उठी है। मुनिकीरेती क्षेत्र में शराब के नशे में धुत्त अजय ठाकुर नामक व्यक्ति ने एक गरीब परिवार के बेटे, अजेन्द्र कंडारी की चाकू से गोद-गोदकर निर्मम हत्या कर दी। अजेन्द्र शारीरिक रूप से विकलांग थे, लेकिन हिम्मत और आत्मसम्मान के साथ अपना जीवन जी रहे थे। उनकी नृशंस हत्या ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है।

यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि मानवता की हत्या कही जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह त्रासदी खुलेआम चल रहे शराब के ठेकों का भयावह परिणाम है, जिनसे पहले भी कई परिवार उजड़ चुके हैं।

जनता में आक्रोश, उठी ठेकों के विरुद्ध आवाज़

स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और युवाओं ने इस घटना पर गहरा रोष व्यक्त किया है। उनका कहना है कि इससे पहले भी क्षेत्र में शराब के नशे के कारण चार निर्दोष लोगों की जान जा चुकी है, लेकिन प्रशासन द्वारा अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

लोगों ने सवाल उठाया है कि —

“आख़िर देवभूमि में शराब के ज़हर से कब तक मासूमों की बलि ली जाएगी?”

परिजनों की व्यथा — ‘हमारे बेटे ने किसी का क्या बिगाड़ा था’

अजेन्द्र के वृद्ध माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल है। वे कहते हैं कि उनका बेटा विकलांग था, पर मेहनत से अपनी ज़िंदगी जी रहा था। उसकी हत्या ने उनके बुढ़ापे का सहारा छीन लिया।

“हमारे बेटे ने किसी का क्या बिगाड़ा था… बस अपने काम से काम रखता था,”
— पिता की टूटी हुई आवाज़ में दर्द छलक पड़ा।

जनता की मांग — कड़ी सज़ा और ठेकों पर रोक

इस जघन्य हत्या के बाद आमजन ने तीन मुख्य मांगें उठाई हैं —

हत्यारे अजय ठाकुर को जल्द से जल्द कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाए।

क्षेत्र में खुले शराब ठेकों की जांच कर उन्हें बंद किया जाए।

देवभूमि को नशे की जकड़ से मुक्त करने के लिए सख्त नीति बनाई जाए।

संवेदना और सवाल दोनों ज़िंदा हैं…

अजेन्द्र की हत्या ने समाज को झकझोर दिया है। देवभूमि, जो तप और साधना की भूमि कही जाती है, आज नशे की गिरफ्त में कराह रही है। लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या विकास के नाम पर हम अपनी संस्कृति और संस्कारों को दांव पर लगा चुके हैं?

हर आंख नम है और हर दिल से एक ही आवाज़ उठ रही है —
“अब बहुत हुआ, देवभूमि को नशे से मुक्त करो!”

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