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टिहरी हेरिटेज सीरीज-7: बूढ़ा केदार, आस्था और इतिहास का अद्भुत संगम

पंच केदार परंपरा का प्राचीन धाम, प्राकृतिक शिवलिंग और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत श्रद्धालुओं को करती है आकर्षित

टिहरी गढ़वाल, 06 जून(दिलीप शर्मा): उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जनपद के भिलंगना ब्लॉक स्थित घनसाली क्षेत्र में अवस्थित बूढ़ा केदार मंदिर धार्मिक आस्था, पौराणिक इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्वितीय संगम है। पंच केदार परंपरा के प्रारंभिक अथवा पांचवें धाम के रूप में प्रतिष्ठित यह प्राचीन मंदिर बाल गंगा और धर्म गंगा नदियों के पवित्र संगम पर स्थित है, जहां प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

महाभारत काल से जुड़ी है मंदिर की मान्यता

बूढ़ा केदार मंदिर समिति के सदस्य मनमोहन रावत के अनुसार स्कंद पुराण में वर्णित इस तीर्थ का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। मान्यता है कि महाभारत युद्ध के उपरांत पांडव गोत्र एवं ब्रह्म हत्या के पापों से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की खोज में हिमालय पहुंचे थे। भगवान शिव ने उनसे मिलने से बचने के लिए वृद्ध व्यक्ति का रूप धारण किया और इसी स्थान पर ध्यानस्थ हो गए। इसके बाद यहां विशाल शिवलिंग प्रकट हुआ, जिसके दर्शन पांडवों ने किए। इसी घटना के कारण इस स्थान का नाम “बूढ़ा केदार” पड़ा।

लोकमान्यता यह भी है कि बूढ़ा केदार के दर्शन किए बिना चारधाम यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती।

उत्तर भारत का विशाल प्राकृतिक शिवलिंग है प्रमुख आकर्षण

मंदिर समिति अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह नेगी के अनुसार मंदिर में स्थापित प्राकृतिक शिवलिंग उत्तर भारत के सबसे विशाल प्राकृतिक शिवलिंगों में से एक माना जाता है। शिवलिंग पर भगवान शिव के वृद्ध स्वरूप, भगवान गणेश, नंदी, पांचों पांडवों और द्रौपदी की आकृतियां स्वाभाविक रूप से उकेरी हुई प्रतीत होती हैं, जो इसे विशेष बनाती हैं।

मंदिर पारंपरिक गढ़वाली वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। लकड़ी और पत्थर की नक्काशी से निर्मित यह मंदिर अपनी कलात्मक संरचना के लिए भी प्रसिद्ध है। मंदिर परिसर में नाथ संप्रदाय के संतों की समाधियां स्थित हैं तथा मान्यता है कि योगी गुरु गोरखनाथ ने भी यहां तपस्या की थी।

राजपूत पुजारी निभाते हैं पूजा-अर्चना की परंपरा

देश के अधिकांश मंदिरों में जहां ब्राह्मण पुजारी पूजा-अर्चना करते हैं, वहीं बूढ़ा केदार मंदिर की विशेषता यह है कि यहां नाथ संप्रदाय से दीक्षित राजपूत पुजारी परंपरागत रूप से धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन करते हैं। मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं के भी कई छोटे मंदिर स्थापित हैं।

प्राकृतिक सौंदर्य के बीच स्थित है पवित्र धाम

नई टिहरी से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थित बूढ़ा केदार मंदिर समुद्र तल से लगभग 1,535 मीटर (5,035 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है। देवदार के घने जंगलों, सीढ़ीदार खेतों और शांत वातावरण से घिरा यह क्षेत्र श्रद्धालुओं और प्रकृति प्रेमियों दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

महाशिवरात्रि और पारंपरिक मेलों में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशाल धार्मिक आयोजन होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं। इसके अलावा जुलाई माह की पूर्णिमा से प्रारंभ होने वाला तीन दिवसीय मेला भी क्षेत्र का प्रमुख धार्मिक आयोजन है।

गुरु कैलापीर देवता, जिन्हें 180 गांवों का इष्ट देवता माना जाता है, का भव्य मेला दीपावली के लगभग एक माह बाद पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ आयोजित किया जाता है।

ट्रेकिंग और पर्यटन के लिए भी महत्वपूर्ण केंद्र

ऋषिकेश और नई टिहरी से घनसाली तक नियमित बस सेवा उपलब्ध है, जबकि घनसाली से निजी वाहनों के माध्यम से मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। अंतिम चरण में लोहे के पुल से लगभग एक किलोमीटर की आसान और मनोरम पैदल यात्रा करनी होती है।

मार्च से जून तथा सितंबर से नवंबर तक का समय मंदिर भ्रमण के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। यही मार्ग महासर ताल, सहस्त्र ताल, जराल ताल और मनझार ताल जैसे प्रसिद्ध उच्च हिमालयी तालों की ट्रेकिंग का प्रमुख प्रवेश द्वार भी है।

रावल अमरनाथ योगी की स्मृतियां आज भी करती हैं मार्गदर्शन

मंदिर यात्रा के दौरान रावल अमरनाथ योगी से प्राप्त ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक जानकारी आज भी इस पावन धाम की स्मृतियों को जीवंत बनाए हुए है। उनके सरल व्यक्तित्व और गहन ज्ञान ने बूढ़ा केदार की परंपराओं और इतिहास को समझने का अवसर प्रदान किया। उनके हालिया निधन से क्षेत्र ने एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक मार्गदर्शक को खो दिया है, लेकिन उनकी शिक्षाएं और स्मृतियां श्रद्धालुओं के बीच सदैव जीवित रहेंगी।

गढ़वाल की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक

बूढ़ा केदार केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि गढ़वाल की समृद्ध सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक धरोहर का जीवंत प्रतीक है। यहां इतिहास, आस्था और प्रकृति का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिलता है, जो श्रद्धालुओं और पर्यटकों को समान रूप से आध्यात्मिक शांति और सांस्कृतिक अनुभूति प्रदान करता है।

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