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डॉ. भगत राम बिजल्वाण ‘भगत’ की गढ़वाली काव्य कृति ‘समूंण’ का विमोचन

संस्कारशाला की 26वीं मासिक काव्य गोष्ठी में बाल एवं वरिष्ठ साहित्यकारों ने दी शानदार प्रस्तुतियां, लोक संस्कृति और मातृभाषा के संरक्षण पर दिया जोर

ऋषिकेश(दिलीप शर्मा): संस्कारशाला काव्य मंच की 26वीं मासिक काव्य संगोष्ठी एवं काव्य पाठ का आयोजन गुमानीवाला स्थित मां गायत्री योगधाम में उत्साहपूर्वक किया गया। संस्था की महासचिव डॉ. सविता रतूड़ी ‘ऋषिनंदिनी’ के प्रतिष्ठान में आयोजित कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. भगत राम बिजल्वाण ‘भगत’ की गढ़वाली काव्य कृति ‘समूंण’ का भव्य विमोचन रहा। इस अवसर पर बाल साहित्यकारों के साथ ही वरिष्ठ कवियों और साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से साहित्यिक वातावरण को जीवंत बनाया।

कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. सविता रतूड़ी द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ अतिथियों के तिलक वंदन से हुआ। इसके पश्चात संस्था के संरक्षक महेश कुड़ियाल ‘अग्निहोत्री’, अध्यक्ष डॉ. संतोष व्यास, डॉ. भगत राम बिजल्वाण और सिद्धि डोभाल ‘सागरिका’ ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया। सुमन किमोठी ने मां शारदे की वंदना प्रस्तुत की, जबकि डॉ. सविता रतूड़ी और डॉ. आशा बहुगुणा ने सामूहिक स्वागत गीत से अतिथियों का अभिनंदन किया।

काव्य गोष्ठी में बाल साहित्यकार आरोही बहुगुणा, अधीरा बेलवाल, आरवी बहुगुणा, मयंक सिंह, मनिका बेलवाल और वैदिक भट्ट ने अपनी शानदार प्रस्तुतियों से उपस्थित लोगों का मन मोह लिया। बाल प्रतिभाओं की रचनात्मक अभिव्यक्ति और साहित्य के प्रति उनके उत्साह की सराहना की गई।

इसके बाद वरिष्ठ साहित्यकार हिमांशु शर्मा ‘मृणालिका’, सिद्धि डोभाल ‘सागरिका’, डॉ. प्रियंका भट्ट ‘प्रिया’, वीरेंद्र सेमवाल ‘अनंत’, डॉ. रश्मि पैन्यूली ‘गिरिजा’, कुसुम व्यास/नौटियाल, डॉ. रचना कुंदनानी, नवीन कुंदनानी, सुमन किमोठी ‘वसुधा’, बबीता व्यास शर्मा, डॉ. आशा बहुगुणा, प्रमिला बिजल्वाण और शकुंतला व्यास ने काव्य पाठ एवं अपने विचारों के माध्यम से साहित्यिक विमर्श को समृद्ध किया।

 

छह खंडों में समाहित हैं लोक संस्कृति और परंपराओं के विविध रंग

 

कार्यक्रम के दौरान डॉ. भगत राम बिजल्वाण ‘भगत’ की गढ़वाली काव्य कृति ‘समूंण’ का विधिवत विमोचन किया गया। पुस्तक की समीक्षा करते हुए संस्कारशाला के अध्यक्ष डॉ. संतोष व्यास ने बताया कि यह काव्य संग्रह छह खंडों में विभाजित है। इसमें देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक परंपराओं, रीति-रिवाजों, लोकजीवन, बोली-भाषा और देशप्रेम से जुड़े विविध विषयों को काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी गई है।

उन्होंने कहा कि अपनी मातृभाषा गढ़वाली में रचित यह पुस्तक सरल और सहज भाषा में पाठकों तक अपनी बात पहुंचाती है। इसमें कवि ने कविताओं के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक मूल्यों और परंपराओं से परिचित कराने के साथ ही उनके लिए आवश्यक संदेश एवं दिशानिर्देश भी प्रस्तुत किए हैं।

कार्यक्रम में उपस्थित साहित्यकारों ने गढ़वाली भाषा और लोक साहित्य के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए इस तरह के साहित्यिक आयोजनों को महत्वपूर्ण बताया। साथ ही डॉ. भगत राम बिजल्वाण को उनकी कृति के विमोचन पर शुभकामनाएं दीं।

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