महिला सुरक्षा को मिला नया सुरक्षा कवच: कुमाऊँ में तैयार होंगे ‘मास्टर ट्रेनर्स’, पीड़िताओं को मिलेगा त्वरित न्याय और मानसिक संबल
हल्द्वानी में राज्य स्तरीय क्षमता संवर्धन कार्यशाला का आयोजन, महिला आयोग ने पुलिस, विधिक सेवा प्राधिकरण और वन स्टॉप सेंटरों के बीच समन्वय को बताया सबसे बड़ी जरूरत

हल्द्वानी, 18 जुलाई(दिलीप शर्मा): उत्तराखंड में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी, संवेदनशील और समन्वित बनाने की दिशा में शनिवार को एक महत्वपूर्ण पहल की गई। राष्ट्रीय महिला आयोग के सहयोग से उत्तराखंड राज्य महिला आयोग द्वारा उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी स्थित सीडीएस जनरल बिपिन रावत बहुउद्देशीय सभागार में एक दिवसीय राज्य स्तरीय क्षमता संवर्धन प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए जमीनी स्तर पर प्रशिक्षित ‘मास्टर ट्रेनर्स’ तैयार करना तथा वन स्टॉप सेंटर, पुलिस और विधिक तंत्र के बीच समन्वय को मजबूत करना रहा।
कार्यक्रम में कुमाऊँ मंडल के सभी जनपदों के वन स्टॉप सेंटरों की काउंसिलर्स, केस वर्कर्स, महिला पुलिसकर्मी, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) के अधिवक्ता एवं संरक्षण अधिकारियों ने भाग लिया।
दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ शुभारंभ
कार्यशाला का शुभारंभ लालकुआँ विधायक मोहन सिंह बिष्ट, नैनीताल के जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल (आईएएस), उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहनी तथा उत्तराखंड राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कण्डवाल ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
इस अवसर पर विधायक मोहन सिंह बिष्ट ने महिला आयोग की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का माध्यम बनेंगे।
‘सिर्फ कानूनी कार्रवाई नहीं, मानसिक संबल देना भी हमारी जिम्मेदारी’ : कुसुम कण्डवाल
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कण्डवाल ने कहा कि जब कोई पीड़ित महिला तमाम सामाजिक बंधनों और भय को पीछे छोड़कर सहायता के लिए किसी संस्था तक पहुंचती है, तब सबसे बड़ी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की होती है। उन्होंने कहा कि केवल कानूनी प्रक्रिया पूरी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि संकट के शुरुआती ‘गोल्डन आवर’ में पीड़िता को सुरक्षित, सम्मानजनक और भयमुक्त वातावरण उपलब्ध कराना सबसे अहम दायित्व है।
उन्होंने कहा कि अदालतों में मामलों के लंबा चलने से कई बार पीड़ित महिलाएं मानसिक रूप से टूट जाती हैं। ऐसे में महिला आयोग, पुलिस विभाग और विधिक सेवा प्राधिकरण को एक मजबूत समन्वित तंत्र के रूप में कार्य करना होगा ताकि पीड़िता को न्याय के साथ मानसिक संबल भी मिल सके।
कुसुम कण्डवाल ने बताया कि इस प्रशिक्षण का उद्देश्य ऐसे ‘मास्टर ट्रेनर्स’ तैयार करना है जो आगे चलकर समाज में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रभावी सुरक्षा तंत्र विकसित कर सकें।
साइबर अपराधों से बचाव और महिला सुरक्षा तंत्र की दी जानकारी
कार्यशाला में पुलिस विभाग की मुख्य वक्ता उप निरीक्षक सुनीता कुंवर ने उत्तराखंड में संचालित महिला सुरक्षा तंत्र की जानकारी देते हुए महिला चीता टीम, डायल-112 और महिला हेल्पडेस्क की कार्यप्रणाली पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने साइबर स्टॉकिंग, ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग, डिजिटल फ्रॉड जैसे बढ़ते साइबर अपराधों से बचाव तथा डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के व्यावहारिक उपाय भी बताए।
उन्होंने वन स्टॉप सेंटर एवं महिला हेल्पडेस्क कर्मियों को विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर पीड़िताओं को शीघ्र न्याय दिलाने के तरीकों से भी अवगत कराया।
भारतीय न्याय संहिता और पोक्सो कानून की दी विस्तृत जानकारी
विधिक सत्र में अभियोजन विभाग के पूर्व अपर निदेशक (विधि) हरि विनोद जोशी ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), पोक्सो अधिनियम, घरेलू हिंसा अधिनियम एवं अन्य संबंधित कानूनों के नवीन प्रावधानों की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बदलते कानूनी परिदृश्य के अनुरूप सभी संबंधित कार्मिकों को नवीन कानूनों की जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है, जिससे पीड़िताओं को समयबद्ध न्याय मिल सके।
ट्रॉमा से जूझ रही महिलाओं की काउंसलिंग पर विशेष जोर
उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के डॉ. ललित मोहन पंत ने मानसिक आघात से गुजर रही महिलाओं की प्रभावी काउंसलिंग की तकनीकों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास में मनोवैज्ञानिक परामर्श की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है और व्यवहारिक एवं मानसिक दोनों स्तरों पर सहयोग उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
‘पीड़िता की पहचान गोपनीय रखना सर्वोच्च प्राथमिकता’
चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. ऐश्वर्या कांडपाल ने कहा कि यौन उत्पीड़न जैसे मामलों में पीड़िता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखना चिकित्सा तंत्र का सबसे बड़ा दायित्व है। उन्होंने संकट के शुरुआती ‘गोल्डन आवर’ में तत्काल प्राथमिक उपचार, संवेदनशील मेडिकल परीक्षण और पीड़िता के आत्मसम्मान की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया।
केवल 17 प्रतिशत महिलाएं ही दर्ज करा पाती हैं शिकायत
महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग की प्रतिनिधि आरती बलोदी ने देशभर के वन स्टॉप सेंटरों के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि सामाजिक पूर्वाग्रह और लोगों की जजमेंटल मानसिकता के कारण अधिकांश महिलाएं शिकायत दर्ज कराने से डरती हैं। उन्होंने बताया कि केवल लगभग 17 प्रतिशत पीड़ित महिलाएं ही साहस जुटाकर रिपोर्ट दर्ज करा पाती हैं।
उन्होंने वन स्टॉप सेंटर के कर्मचारियों से सर्वाइवर-सेंट्रिक दृष्टिकोण अपनाने, संवेदनशील व्यवहार करने तथा पीड़ित महिलाओं को पुनर्वास एवं कल्याणकारी योजनाओं का तत्काल लाभ दिलाने का आह्वान किया।
खुले संवाद सत्र में अधिकारियों ने साझा किए अनुभव
कार्यशाला के समापन पर आयोजित खुले संवाद सत्र में कुमाऊँ मंडल के विभिन्न जनपदों से आए वन स्टॉप सेंटर कर्मियों, हेल्पडेस्क प्रभारियों और अधिकारियों ने अपने अनुभव साझा किए तथा कार्य के दौरान आने वाली व्यावहारिक समस्याओं पर विशेषज्ञों से समाधान प्राप्त किया।
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. नागेंद्र गंगोला ने किया।
ये रहे प्रमुख रूप से उपस्थित
कार्यशाला में राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष सायरा बानो, विधायक मोहन सिंह बिष्ट, कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहनी, जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल, आयोग की सदस्य विमला अधिकारी, डॉ. रेनू प्रकाश, डॉ. नमिता वर्मा, डॉ. आशुतोष पंत, आधार वर्मा, आयोग के अधिकारी-कर्मचारी सहित विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।










