



ऋषिकेश,(दिलीप शर्मा): विजयादशमी के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती के सान्निध्य में परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों ने वेद, उपनिषद, पुराण एवं शास्त्रों का विधिवत पूजन किया। इस अवसर पर भारतीय ज्ञान परंपरा, ऋषि-मनीषा और शाश्वत जीवन मूल्यों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने गुरुकुलों में शास्त्र एवं शस्त्र पूजन की परंपरा को जीवंत बनाए रखने का आह्वान करते हुए इसे भावी पीढ़ी के चरित्र निर्माण और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ने पर जोर दिया।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि शास्त्र एवं शस्त्र पूजन को केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे जीवन निर्माण की सतत प्रक्रिया के रूप में अपनाना जरूरी है। नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक उत्तरदायित्व से जोड़ना समय की आवश्यकता है।

शास्त्र जीवन को सही दिशा देने का माध्यम
भारतीय परंपरा में शास्त्रों को जीवन को समझने, कर्तव्यों का बोध कराने और सही-गलत के बीच विवेकपूर्ण निर्णय लेने का मार्गदर्शक माना गया है। वेद व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं, उपनिषद आत्मबोध और चेतना की गहराई से परिचित कराते हैं, जबकि पुराण आदर्शों को कथाओं के माध्यम से जनमानस तक पहुंचाते हैं। धर्मशास्त्र जीवन के विभिन्न आयामों में कर्तव्य, मर्यादा और उत्तरदायित्व का बोध कराते हैं।
शास्त्र पूजन का वास्तविक अर्थ केवल ग्रंथों के सम्मुख दीप प्रज्वलित करना नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति विनम्रता रखना, सत्य को स्वीकार करना और अपने आचरण को सद्ज्ञान के अनुरूप बनाना है। ग्रंथों की सार्थकता तभी है, जब उनमें निहित आदर्श व्यवहार, निर्णय और जीवनशैली में दिखाई दें तथा समाज में करुणा, न्याय और सेवा की भावना मजबूत हो।
सूचना से अधिक जरूरी है विवेक
वर्तमान दौर में सूचनाओं और तकनीक का तेजी से विस्तार हो रहा है, लेकिन सूचना और ज्ञान में अंतर है। उचित-अनुचित का निर्णय लेने, प्रलोभनों से बचने और शक्ति का सदुपयोग करने के लिए विवेक आवश्यक है। शास्त्र पूजन इसी विवेक को जागृत करने का सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक अवसर प्रदान करता है।
गुरुकुल परंपरा में शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका अर्जित करना नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का समग्र विकास करना रहा है। यहां ज्ञान के साथ विनम्रता, सामर्थ्य के साथ संयम, अधिकार के साथ कर्तव्य और सफलता के साथ सेवा की भावना विकसित करने पर बल दिया जाता है।
ज्ञान के साथ संस्कार और समाज के प्रति उत्तरदायित्व जरूरी
विजयादशमी पर शास्त्र पूजन विद्यार्थियों को यह संदेश देता है कि शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य केवल अधिक जानकारी प्राप्त करना नहीं, बल्कि सही दृष्टिकोण के साथ जीवन जीना है। यदि ज्ञान से अहंकार बढ़े, सामर्थ्य से संवेदनशीलता कम हो और सफलता के साथ समाज के प्रति उत्तरदायित्व समाप्त हो जाए, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
गुरुकुलों में शास्त्र पूजन की परंपरा को जीवंत बनाए रखने का उद्देश्य नई पीढ़ी को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना और उसे वर्तमान के लिए प्रेरणा तथा भविष्य के लिए मार्गदर्शन के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित करना है।
परमार्थ निकेतन में आयोजित शास्त्र पूजन के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि आध्यात्मिकता जीवन से विमुख होने का नहीं, बल्कि उसे अधिक जागरूक, उत्तरदायी और लोकमंगलकारी बनाने का मार्ग है। शास्त्रों से विवेक, शस्त्रों से सुरक्षा और भगवान श्रीराम के आदर्शों से मर्यादित आचरण की प्रेरणा लेकर ही विजयादशमी के पर्व को सार्थक बनाया जा सकता है।
ज्ञान से विवेक, शक्ति से सुरक्षा, शिक्षा से संस्कार और धर्म से मानवता को मजबूत करने का संकल्प ही विजयादशमी का शाश्वत संदेश है।





